गणतंत्र दिवस के 76 वर्ष: क्या भारत अपने संवैधानिक मूल्यों से दूर होता जा रहा है?

यह गणतंत्र दिवस मुझे पहले से कहीं ज़्यादा तकलीफ़ दे रहा है, ऐसा नहीं है कि पिछले वर्षों में इस दिन ने हमारी ज़िंदगी में कोई बड़ा बदलाव ला दिया हो लेकिन कम से कम तब एक दिखावा तो था। एक राष्ट्रीय रस्म के तौर पर ही सही, हिंदू-मुसलमान सभी भारतीय इस दिन को साथ मिलकर मनाते थे, जो हमें एक ऐसे संविधान से जोड़ता था जिसकी प्रस्तावना न्याय, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की गारंटी देती है।

लेकिन आज, भारत के गणराज्य बनने के 76 साल बाद, संविधान ने जो वादे किए थे, उनमें से कई टूटते नज़र आ रहे हैं। भारत के मुसलमान आज नफ़रत और भेदभाव की लगातार मार झेल रहे हैं। उन्हें न सिर्फ़ न्याय से वंचित किया जा रहा है बल्कि क़ानून के सामने समानता का दिखावा भी ख़त्म होता जा रहा है। मुसलमानों को उजाड़ा जा रहा है, उनके अधिकार छीने जा रहे हैं, उनके घर गिराए जा रहे हैं और उन्हें इतिहास की किताबों और समाज की सामूहिक याद से मिटाने की कोशिश हो रही है।

आज हम संविधान की क़सम तो खाते हैं लेकिन ज़्यादातर सिर्फ़ शब्दों में, भावनाओं में नहीं। यह इसलिए नहीं कि पूरे देश की बहुसंख्या ऐसा चाहती है बल्कि इसलिए कि बहुसंख्यक समाज का एक बड़ा हिस्सा और राजनीतिक वर्ग उदासीनता और तिरस्कार को चुन चुका है।

आज़ादी के बाद भारत एक अनोखा देश बना था, जिसने अपनी विविध आबादी और सभी अल्पसंख्यकों को समान अधिकार दिए। जब दुनिया के कई देश नस्ल या धर्म के आधार पर बन रहे थे, तब भारत ने बहुलतावादी लोकतंत्र चुना। यह इसलिए नहीं था कि यहाँ कई धर्म थे बल्कि इसलिए कि यहाँ एक बड़ी हिंदू आबादी थी जिसने ऐसा भारत चुना।

लेकिन आज यह भी सच है कि भारत एक बहुसंख्यकवादी और बहिष्कृत करने वाला लोकतंत्र बनता जा रहा है क्योंकि हिंदू बहुसंख्या का बड़ा हिस्सा इसे स्वीकार करता दिख रहा है। इस बहुसंख्यकवाद ने देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक मुसलमानों को “दूसरा” बना दिया है। मुसलमानों और इस्लाम के ख़िलाफ़ फैल रही नफ़रत को चुपचाप मंज़ूरी दी जा रही है।

यह नया बहुसंख्यक भारत मुसलमानों के जबरन और चरम स्तर के अलगाव का हिस्सेदार बन चुका है, सिर्फ़ शहरों और मोहल्लों में नहीं बल्कि लोगों की सोच में भी। बीते एक दशक में राजनीतिक फ़ायदे दिलाने वाले इस बहुसंख्यकवाद ने सत्ताधारी दलों और सरकारों को खुले तौर पर मुसलमान-विरोधी नीतियाँ अपनाने का हौसला दिया है। संस्थान पक्षपातपूर्ण चुप्पी में डूब गए हैं और प्रशासन अपने संवैधानिक कर्तव्यों को भूलता जा रहा है।

आज ऐसा लगता है कि भारत के मुसलमानों को “भारत के विचार” ने नहीं बल्कि उन्हीं लोगों ने निराश किया है, जिनकी भाईचारे की बातों पर भरोसा करके उन्होंने पाकिस्तान के विचार को ठुकराया और एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत को चुना।
दो-राष्ट्र सिद्धांत को नकारने के लिए मुसलमानों को सराहा जाना चाहिए था लेकिन पिछले कई सालों में उन्हें बार-बार यह एहसास दिलाया गया कि उनका फ़ैसला ग़लत था। उन्हें अपने भविष्य को लेकर शक करने पर मजबूर किया जा रहा है।

यह सब छुपकर नहीं बल्कि खुलेआम हो रहा है। एक ऐसा भारत बनाया जा रहा है, जहाँ लगभग 25 करोड़ मुसलमानों को बराबरी के अधिकारों से दूर किया जा रहा है जबकि देश विकास और आर्थिक ताक़त के सपने देख रहा है।
आज भारत एक गणराज्य होने का सिर्फ़ दिखावा कर रहा है, एक ऐसा लोकतंत्र जो धीरे-धीरे “हिंदुओं का, हिन्दुओं द्वारा, हिंदुओं के लिए” बनता जा रहा है।

मैं, मेरे माता-पिता, उनके माता-पिता और उनसे पहले की पीढ़ियाँ इसी धरती पर पैदा हुए। आज से लगभग पंद्रह पीढ़ी पहले मेरे पूर्वजों ने इस्लाम को चुना था, जैसे इस देश के लाखों लोगों ने अपने-अपने धर्म चुना था। उन्होंने कभी यह कल्पना नहीं की होगी कि उनकी आने वाली पीढ़ियों को सिर्फ़ इसलिए कष्ट सहना पड़ेगा क्योंकि उन्होंने इस्लाम को अपना धार्मिक और आध्यात्मिक मार्ग बनाया, एक ऐसा इस्लाम जो इसी देश में रचा-बसा और हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई, यहूदी और अन्य धर्मों के साथ शांति से रहा। ‘भारत और इस्लाम’ ये दोनों हमारी पहचान हैं। हमें इन पर गर्व है और ये हमारे लिए गैर-समझौतावादी हैं।

मुसलमानों को “दूसरा” साबित करना अब एक ऐसा काम बन गया है जिसे दिखावे में “लोकतांत्रिक” बताया जा रहा है। यह काम संसदों के भीतर क़ानूनों के ज़रिये और प्रशासनिक परियोजना के रूप में किया जा रहा है। राजनीतिक सत्ता के शीर्ष स्तर पर इसे बिना किसी डर के अपनाया और निखारा जा रहा है और उनके आज्ञाकारी संस्थानों के ज़रिये इसे लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है

हमारी दूसरी पहचान को अब बहुसंख्यकवादी राजनीति का हथियार बना लिया गया है, ताकि हमें निशाना बनाया जा सके और हमारी पहली पहचान तथा हमारे लोकतांत्रिक अधिकार हमसे छीन लिए जाएँ। हमारी भारतीय पहचान पर लगातार इतने सवाल उठाए गए हैं कि अब हमारी देशभक्ति पर शक करना लगभग सामान्य और स्वीकार्य बात बना दी गई है।

मुसलमानों को खुलेआम बाहरी, घुसपैठिया, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी, ग़द्दार, देशद्रोही और हर तरह का “जिहादी” कहा जाता है जैसे ज़मीन जिहाद, लव जिहाद, थूक जिहाद, चूड़ी जिहाद, खाने का जिहाद, सड़क जिहाद आदि। यह सब किसी हाशिए के लोग नहीं कहते बल्कि देश की सत्ता और राजनीतिक नेतृत्व करने वाले लोग कहते हैं।
और ताकि यह सब क़ानूनी जाँच-पड़ताल में सही ठहराया जा सके, संस्थानों को निर्देश दिए जा रहे हैं कि वे उन मुसलमानों की पहचान और नागरिकता पर सवाल उठाएँ, उनकी जाँच करें और उन्हें अमान्य ठहराएँ, जो बंगाली, उर्दू या कोई और भाषा बोलते हैं, ठीक वैसे ही जैसे उनके हिंदू भाई-बहन बोलते हैं और फिर भी भारतीय हैं।

नफ़रत भरे नारे खुलेआम लगाए जाते हैं…
“देश के ग़द्दारों को गोली मारो सालों को।”
“मुसलमानों के दो ही स्थान- पाकिस्तान या क़ब्रिस्तान।”
“बाबर की औलाद।”
“तेल लगाओ डाबर का, नाम मिटाओ बाबर का।”
“हिंदुस्तान में रहना होगा तो जय श्री राम कहना होगा।”
“जब मुसलमान काटे जाएँगे, तब राम-राम चिल्लाएँगे।”
“न मुल्लों का, न क़ाज़ी का, यह देश है वीर शिवाजी का।”

सैकड़ों नेताओं और हज़ारों राजनीतिक व दक्षिणपंथी रैलियों में ऐसे नारे लगाए गए हैं, जो मुसलमानों की हत्या और तबाही की खुली माँग करते हैं। लेकिन न तो सत्ता, न प्रशासन और न ही न्यायपालिका ने इन्हें इतना ख़तरनाक माना कि उनकी निंदा हो या सज़ा दी जाए।

मैं आज भी और हर दिन अपने गणराज्य का गर्व से जश्न मनाऊँगा, जैसे मैं अपने धर्म का जश्न मनाता हूँ। मैं हमेशा मुसलमान रहूँगा और भारतीय रहूँगा और मैं भारत के उस विचार और हमारे गणराज्य को संजोकर रखूँगा, जो हमें यह आज़ादी देता है कि हम कौन हैं, क्या बोलते हैं, क्या पहनते हैं, क्या खाते हैं और किसके साथ रहना चाहते हैं।

(यह लेखक के अपने विचार हैं।)

लेखक :
अब्दुल मुकित
( पत्रकार UNI न्यूज़ एजेंसी )

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