आयरिश अभिनेता लियाम नीसन की एक मशहूर फिल्म है “TAKEN” इस फिल्म में उन्होंने एक रिटायर्ड सीआईए एजेंट का किरदार निभाया है। उनकी 17 साल की बेटी को मानव तस्करी करने वाला एक गिरोह पेरिस में अगवा कर लेता है।
नीसन अपनी बेटी को ढूंढने के लिए हर संभव कोशिश करता है और आखिरकार अपराधियों तक पहुंच जाता है। वे लोग उसे बताते हैं कि उसकी बेटी को मध्य पूर्व के एक शेख को बेच दिया गया है और वह किसी भी समय अपने निजी जहाज से अपने देश जा सकता है। आखिर में नीसन सही समय पर पहुंच जाता है और अपनी बेटी को उनके चंगुल से छुड़ा लेता है। यह फिल्म सच में देखने लायक है।
इस समझौते की बाद में काफी आलोचना हुई क्योंकि सरकारी वकीलों ने उस पर ज्यादा गंभीर आरोपों में मुकदमा नहीं चलाया था। 2008 की सज़ा के बाद मामला कुछ समय के लिए शांत हो गया लेकिन पीड़ितों द्वारा दायर किए गए सिविल मुकदमों और पत्रकारों की जांच के कारण यह मामला फिर से चर्चा में आ गया। आखिरकार जुलाई 2019 में उसे न्यूयॉर्क में फिर से संघीय आरोपों के तहत गिरफ्तार किया गया। इस बार उस पर कम उम्र लड़कियों की तस्करी और संगठित यौन शोषण के आरोप थे। सरकारी पक्ष का कहना था कि उसने 2002 से 2005 के बीच दर्जनों नाबालिग लड़कियों को अपने घर बुलाकर उनका शोषण किया।
आज इस फिल्म की कहानी जेफरी एप्सटीन की वजह से याद आई। वही जेफरी एप्सटीन जिसकी हालिया दिनों में सामने आई ईमेल्स ने दुनिया भर में हलचल मचा दी है। उस पर कम उम्र लड़कियों का यौन शोषण करने के आरोप लगे थे। उसे सज़ा भी हुई और बाद में वह जेल में ही मर गया। पेशे से एप्सटीन खुद को ‘फाइनेंसर’ यानी निवेश से जुड़ा व्यक्ति बताता था। हालांकि उसकी असली कमाई के स्रोत हमेशा सवालों में रहे। उसने खुद को एक प्रभावशाली निवेशक के रूप में पेश किया। उसने न्यूयॉर्क, फ्लोरिडा और अमेरिकी वर्जिन आइलैंड्स में बड़ी-बड़ी संपत्तियां खरीदीं। उसके पास एक निजी विमान भी था, जिसे बाद में मीडिया ने ‘लोलीटा एक्सप्रेस’ नाम दिया।
एप्सटीन के खिलाफ गंभीर आरोप पहली बार 2000 के दशक में सामने आए, जब फ्लोरिडा में कम उम्र लड़कियों के साथ यौन शोषण के सबूत मिले। एक 14 साल की लड़की के पिता ने आरोप लगाया कि एप्सटीन ने उसकी बेटी के साथ बलात्कार किया। साल 2008 में उसने एक विवादित ‘प्ली बार्गेन’ समझौते के तहत आरोप स्वीकार किए। इसके बाद उसे वेश्यावृत्ति यानी जिस्म फरोशी से जुड़े आरोप में सज़ा हुई और वह करीब 13 महीने जेल में रहा। लेकिन उसे ‘वर्क रिलीज़’ की सुविधा मिली, जिसके तहत वह दिन में जेल से बाहर जा सकता था।
गिरफ्तारी के समय उसके न्यूयॉर्क वाले घर से बड़ी संख्या में तस्वीरें और दस्तावेज़ मिले। उस पर औपचारिक रूप से आरोप तय किए गए लेकिन मुकदमा पूरा नहीं हो सका। 10 अगस्त 2019 को वह न्यूयॉर्क की जेल में मृत पाया गया। उसकी मौत से दुनिया भर में कई सवाल उठे लेकिन सरकारी तौर पर इसे आत्महत्या बताया गया।
इंटरनेट और सोशल मीडिया पर जेफरी एप्सटीन की ईमेल्स और रिकॉर्डिंग्स की बहुत चर्चा है। बताया जाता है कि यह सामग्री अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा जारी की गई। यह सब जानकारी लोगों को हैरान करने वाली है। कई बड़े राजनेताओं और प्रभावशाली लोगों के नाम उसके साथ जुड़े बताए जा रहे हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति का उससे मिलना या संपर्क में होना यह साबित नहीं करता कि उसने कोई अपराध किया। लेकिन सोशल मीडिया पर मौजूद कुछ रिकॉर्डिंग्स और दस्तावेज़ों में अमेरिकी नेताओं से लेकर यूरोप के कुछ शाही परिवारों के लोगों के नाम तक सामने आए हैं। इन मामलों की सच्चाई और कानूनी स्थिति अलग-अलग जांच का विषय रही है।
शुरू में मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि ये असली वीडियो हैं। जिस तरह खुलेआम और बेझिझक तरीके से तथाकथित ‘सभ्य दुनिया के नेता’ कम उम्र लड़कियों को छू रहे थे, उसे देखकर लगा कि शायद ये नकली वीडियो हों। ये सभी लोग सूट-टाई पहनने वाले पुरुष और स्कर्ट-ब्लाउज पहनने वाली महिलाएं थीं। इनमें से कोई पुरुष सर पर अमामा नहीं पहनता और कोई महिला बुर्का नहीं पहनती।
जहां ये गलत काम हुए वह कोई मदरसा नहीं था बल्कि अमेरिका में स्थित एक द्वीप था। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि हम अपने समाज की गलतियों से संतुष्ट हो जाएं। बात सिर्फ इतनी है कि जिस पश्चिमी सभ्यता की अक्सर बहुत तारीफ की जाती है, वहां भी गंभीर नैतिक समस्याएं मौजूद हैं। फर्क इतना है कि हम खुद को अनपढ़ और पिछड़ा मानते हैं और उन्हें महान दार्शनिकों जैसे कांट, हेगेल और नीत्शे का अनुयायी समझते हैं।
फिल्म Taken में भी कम उम्र लड़कियों का खरीदार एक अरब शेख को दिखाया गया है न कि सूट-बूट पहने किसी अमेरिकी राजनेता को। अगर एप्सटीन की सूची में किसी मौलवी, मदरसे के प्रबंधक या दाढ़ी वाले व्यक्ति का नाम होता तो अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भी तुरंत सक्रिय हो जातीं।
हमें अक्सर यह बताया जाता है कि ऐसी घटनाएं कट्टर सोच का नतीजा होती हैं जो मदरसों में पनपती है और आगे चलकर यौन अपराधों में बदल जाती है। लेकिन जब मामला सूट-बूट पहनने वाले “सर”, “प्रिंस” और “मिस्टर प्रेसिडेंट” जैसे ताकतवर लोगों का हो तो अक्सर कहा जाता है कि मामला अदालत के बाहर ही सुलझा लिया गया है। एप्सटीन को पहली बार इसलिए रियायत मिली क्योंकि उसके संबंध बहुत प्रभावशाली लोगों से थे। यह वही न्याय व्यवस्था है जिसकी मिसालें हमें अक्सर दी जाती हैं।
कई वर्षों तक हॉलीवुड और मीडिया के जरिए यह छवि बनाई गई कि मुस्लिम पुरुष, खासकर अरब के शेख या दाढ़ी वाले लोग महिलाओं के लिए खतरा होते हैं और यौन शोषण से जुड़े होते हैं। लेकिन जब एप्सटीन मामला सामने आया तो आरोपों में किसी शेख या मौलवी का नाम नहीं बल्कि ब्रिटेन के प्रिंस एंड्रयू जैसे प्रभावशाली व्यक्ति का नाम चर्चा में आया।
इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि कहीं और होने वाले अपराधों का बचाव किया जाए या यह कहा जाए कि दूसरे समाजों में अपराध ज्यादा हैं। बात सिर्फ इतनी है कि किसी भी समाज या संस्कृति को पूरी तरह अच्छा या बुरा बताना सही नहीं है। जब भी कोई केवल पश्चिमी मूल्यों की ही तारीफ करे, तो यह सवाल उठाया जा सकता है कि हर समाज में अच्छाइयों के साथ कमियां भी होती हैं।
फिल्म Taken जैसी कई फिल्मों को इस तरह के चित्रण का उदाहरण माना जाता है लेकिन सच तो यह है कि जब पर्दा उठा तो न तो कोई शेख सामने आया और न ही कोई मौलवी बल्कि प्रिंस एंड्रयू सामने आए। इस का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि मदरसे में बच्चों का शोषण करने वाले मौलवियों का बचाव किया जाए और यह कहा जाए कि गोरे लोग हमसे भी ज़्यादा सेक्सुअली बीमार हैं। बस एक ही रिक्वेस्ट है कि अगली बार जब कोई तुम्हें वेस्टर्न वैल्यूज़ के क़सीदे सुनाये तो उनसे सरगोशी के अन्दाज़ में फक़त यह पूछ लीजिएगा कि, “यार! वह एपस्टीन फाइलों में कोई मौलवी क्यों नहीं मिला?”
अब्दुल मुक़ीत (UNI में पत्रकार)
“इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं।”













