शहाब आलम, सोशल एक्टिविस्ट, हैदराबाद
तेलंगाना के हैदराबाद में स्थित हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी (HCU) के छात्रो ने 400 एकड़ वन भूमि बचाने के लिए प्रोटेस्ट कर रहे हैं. जिसको तेलंगाना शासन द्वारा बुलडोज किया जा रहा है. छात्रों की प्रदर्शन को देखते हुए सोमवार (31 मार्च) को यूनिवर्सिटी परिसर के अंदर और बाहर बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया. जिसके बाद छात्रों और पुलिसकर्मी के बीच झड़प भी हुई है. यह झड़प छात्रों द्वारा जंगलों को उजाड़ने से रोकने के लिए हुई है.
दरअसल, तेलंगाना की कांग्रेस सरकार द्वारा इस जंगलों को उजाड़कर आईटी पार्क स्थापित करने का निर्णय लिया गया था. सरकार इस आईटी पार्क को सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के किसी निजी हाथों में सौंपने का थी. जिसकी आलोचना यूनिवर्सिटी के छात्रों, राज्य में विपक्षी भारत राष्ट्र समिति (BRS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने की है. यह भूमि हैदराबाद के कांचा गचीबोली के शहरी विकास क्षेत्र का हिस्सा है और इस पर राज्य सरकार तथा विश्वविद्यालय दोनों का दावा है.
इससे पहले पुलिस ने रविवार (30 मार्च) को बुलडोजर के ऑपरेटरों को रोकने का प्रयास करने पर 52 छात्रों को गिरफ्तार किया था, जिन्हें बाद में निजी मुचलके पर रिहा कर दिया गया. रात में जमीन को समतल करने के लिए दर्जनों बुलडोजर तैनात किए गए. 29 मार्च को छात्रों ने सरकार की इस फैसले पर तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए रेवंत रेड्डी का पुतला जलाया था.
इस विवाद के केंद्र में 400 एकड़ भूमि के स्वामित्व को लेकर दो दशक पुराना विवाद है. यह मामला 2022 में तब निर्णायक मोड़ पर पहुंचा, जब तेलंगाना उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि सरकार द्वारा विश्वविद्यालय को भूमि हस्तांतरित करने की पुष्टि करने वाला कोई हस्तांतरण विलेख उपलब्ध नहीं है.
हैदराबाद विश्वविद्यालय ने 1975 में उस आवंटित 2,324 एकड़ भूमि के कानूनी स्वामित्व का दावा करते हुए मामला दायर किया था, जिसमें विवादित 400 एकड़ भूमि भी शामिल थी. विश्वविद्यालय का तर्क था कि सरकार के नक्शे गलत थे.
अदालत ने माना कि किसी ठोस दस्तावेज़ के अभाव में सरकार भूमि का स्वामित्व बरकरार रखती है. इसके अलावा, विश्वविद्यालय ने अपनी भूमि के कुछ अन्य हिस्से भी सरकार को सौंप दिए, जिससे सरकार का दावा और मजबूत हुआ. 2022 के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने भी पिछले साल बरकरार रखा था.
एचसीयू भूमि अधिग्रहण और वन्यजीव संरक्षण जैसे गंभीर मुद्दों पर के.टी. रामाराव (KTR) ने अपनी बात रखी और सरकार की नीतियों तथा नीयत पर सवाल उठाए हैं, लेकिन सवाल यह भी उठता है कि जब सरकार की नीयत पर उंगली उठाई जा रही है, तो क्या यह सवाल केवल एक पक्ष तक सीमित रहना चाहिए!
उदाहरण के लिए मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी (MANUU) हैदराबाद की लगभग तीन एकड़ ज़मीन का अधिग्रहण कर वहां सड़क निर्माण करवाया गया और यह तब हुआ जब पूरा देश और खासतौर पर शैक्षणिक संस्थान कोरोना महामारी के चलते बंद थे. उस समय की सरकार ने इस परिस्थिति का लाभ उठाकर अधिग्रहण को पूरा कर लिया था.
आज, जब वह सड़क बन चुकी है, तो इसके ठीक विपरीत दिशा में पड़ी बंजर ज़मीन पर 1000 करोड़ रुपये से अधिक की डील हो चुकी है और निर्माण कार्य भी जोरों पर है. यह संयोग मात्र नहीं हो सकता कि जब यह अधिग्रहण हुआ, तब कैंपस में छात्र नहीं थे, जिससे कोई विरोध की आवाज़ नहीं उठी. सरकार ने इस परिस्थिति का पूरा फायदा उठाकर अधिग्रहण को आसानी से अंजाम तक पहुंचाया.
MANUU कैंपस पहले से ही केवल 200 एकड़ में सिमटा हुआ है, जो अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों की तुलना में काफी छोटा है. ऐसे में अगर सरकार विकास के नाम पर इस सीमित भूमि का अधिग्रहण करना जारी रखेगी, तो सवाल उठता है कि भविष्य में अकादमिक इमारतें, छात्रावास (हॉस्टल) और अन्य आवश्यक बुनियादी सुविधाएं कहां बनाई जाएंगी!
शैक्षणिक संस्थानों की ज़मीनें केवल भवन निर्माण और व्यावसायिक सौदों के लिए नहीं होती, बल्कि उनका उद्देश्य शिक्षा और शोध को बढ़ावा देना होता है. अगर इसी तरह भूमि अधिग्रहण का सिलसिला जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में विश्वविद्यालय का विस्तार संभव नहीं रहेगा और छात्रों के लिए आवश्यक संसाधन सीमित होते जाएंगे.
लेकिन केवल सरकार को दोष देना पर्याप्त नहीं होगा. हमें यह भी विचार करना चाहिए कि इस पूरे घटनाक्रम में विश्वविद्यालय प्रशासन, विशेष रूप से वाइस चांसलर (VC) की क्या भूमिका रही होगी! क्या यह संभव है कि इतने बड़े स्तर पर हुआ यह अधिग्रहण विश्वविद्यालय प्रशासन की सहमति या निष्क्रियता के बिना संभव हो पाता!
इस पूरी घटना पर गहन मंथन करने की आवश्यकता है! क्या सरकारें विकास के नाम पर शैक्षणिक परिसरों की ज़मीनों का इसी तरह उपयोग करती रहेंगी! और क्या विश्वविद्यालयों के शीर्ष पदाधिकारी, जिन पर अकादमिक संस्थानों की रक्षा की जिम्मेदारी है, ऐसे मामलों में अपनी ज़िम्मेदारी से बचते रहेंगे!
यह सिर्फ एक विश्वविद्यालय की कहानी नहीं है, बल्कि यह सवाल देश के हर शैक्षणिक संस्थान की संप्रभुता और स्वायत्तता पर भी उठता है. अगर आज इस पर सवाल नहीं उठाए गए, तो कल अन्य शिक्षण संस्थानों की ज़मीनें भी इसी तरह ‘विकास’ के नाम पर बेची जाएंगी, और शैक्षिक परिसरों को व्यावसायिक केंद्रों में तब्दील कर दिया जाएगा.
( यह मत लेखक के अपने है )













