बिहार में कुछ महीने बाद विधानसभा का चुनाव होने वाला है. जैसे-जैसे गर्मी का पारा चढ़ रहा है. वैसे-वैसे राज्य में राजनीतिक सरगर्मियां भी तेज हो रही है. 2025 विधानसभा चुनाव में जातिगत जनगणना चुनावी बहस का बड़ा मुद्दा बन गया है. सत्तारूढ़ एनडीए और विपक्षी दलों के बीच इसे लेकर तीखी बयानबाजी भी तेज हो गई है. इस मुद्दे को लेकर सभी पार्टियां अपनी अपनी सियासी जमीन तलाशने की कोशिश कर रही है.
इस मुद्दे पर ताजा विवाद तब खड़ा हुआ, जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बिहार में हुई जातिगत जनगणना को फेक और लोगों को बेवाकूफ बनाने का तरीका’ बताया था. 18 जनवरी को पटना में कांग्रेस के संविधान सुरक्षा सम्मेलन में लोकसभा नेता प्रतिपक्ष ने कहा था ‘हम बिहार जैसी जातिगत जनगणना नहीं करेंगे, जो लोगों को धोखा देने के लिए की गई हो. हम इसे इस तरह करेंगे कि हर जाति समूह की सही भागीदारी का पता चले’ उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा बढ़ाने के पक्ष में हैं.
राहुल गांधी के इस बयान पर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया. इस बयान की सफाई देते हुए कांग्रेस ने कहा कि ‘उन्होंने सिर्फ यह सवाल उठाया था कि बिहार सरकार ने नवंबर 2023 में विभिन्न जातियों के आरक्षण को 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत करने का जो फैसला लिया, उसे संविधान की नौवीं अनुसूची में क्यों शामिल नहीं किया गया! यदि सरकार की नीयत सही होती तो इसे संविधान के नौवीं अनुसूची में रख देती, तब यह कानूनी चुनौतियों से बाहर आ जाता’.
NDA नेताओं ने राहुल गांधी पर पलटवार करते हुए उनकी दोहरे रवैये की आलोचना की. एनडीए नेताओं ने कहा कि कांग्रेस तब महागठबंधन सरकार का हिस्सा थी, जब बिहार में जातिगत सर्वेक्षण कराया गया था.
इसी बीच, 3 मार्च को नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली बिहार सरकार ने विधानसभा में राज्य का बजट पेश किया. इससे पहले विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने मांग की थी कि बजट जातिगत सर्वेक्षण के नतीजों पर आधारित होना चाहिए.
कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव तौकीर आलम ने NDA सरकार की आलोचना करते हुए कहा ‘नीतीश कुमार की डबल इंजन सरकार सिर्फ चुनावी फायदे के लिए जातिगत जनगणना का इस्तेमाल कर रही है. बीजेपी और जेडीयू के पास इस सर्वे के आधार पर नीतियां लागू करने का कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं है. जिन परिवारों की मासिक आय 6000 रुपए हैं, उन्हें 2 लाख रुपए की आर्थिक सहायता देने का वादा किया गया था. लेकिन यह अभी तक पूरा नहीं किया और न ही भारतीय जनता पार्टी आरक्षण को 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत करने दे रही है. अगर हमारी सरकार बनती है तो हम आरक्षण की सीमा बढ़ाने की लड़ाई लड़ेंगे’.
भाकप माले (CPI-ML) के राज्यसभा सदस्य तारिक अनवर ने कहा कि जातिगत जनगणना के कारण सरकारी नौकरियों, शैक्षणिक छात्रवृत्तियों और आर्थिक सहायता की मांग बढ़ी है. उन्होंने कहा ‘बिहार के पास सीमित राजस्व स्रोत है और यह केंद्र सरकार के फंड पर निर्भर है. जातिगत आंकड़ों के आधार पर बड़े पैमाने पर कल्याणकारी योजनाएं लागू करने के लिए ओबीसी, ईबीसी, एससी और एसटी के लिए अधिक बजट की जरूरत होगी’.
जातिगत जनगणना पर सियासी घमासान
जेडीयू के महासचिव के.सी. त्यागी ने कहा कि केंद्र सरकार के 2025-26 के बजट में बिहार को जो प्राथमिकता मिली है, वह दिखाता है कि एनडीए सरकार पिछड़े वर्गों के विकास के लिए कितनी गंभीर है. उन्होंने कहा ‘नीतीश कुमार के नेतृत्व में हुई जातिगत जनगणना से बिहार में मौजूद सामाजिक असमानता का पर्दाफाश हुआ. इस साल के केंद्रीय बजट में बिहार के विकास के लिए विशेष धनराशि दी गई है. ये योजनाएं राज्य के पिछड़ों और वंचित समुदायों को सीधा लाभ मिलेगी’.
केंद्र सरकार ने 2025-26 के बजट में बिहार के लिए कई बड़े प्रोजेक्टों की घोषणा की है. इनमें एक नया मखाना बोर्ड, एक ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट, मिथिलांचल में पश्चिमी कोसी नहर परियोजना(Western Koshi Canal Project) के लिए वित्तीय सहायता, आईआईटी पटना के बुनियादी ढांचे का विस्तार और राज्य में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फूड टेक्नोलॉजी, एंटरप्रेन्योरशिप और मैनेजमेंट की स्थापना शामिल है.
आरजेडी प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने अपनी पार्टी की तारीफ करते हुए कहा कि जातिगत जनगणना तब हुई जब आरजेडी सरकार में थी. उन्होंने कहा ‘हमारी पार्टी की पहचान ही सामाजिक न्याय (Social Justice) और धर्मनिरपेक्षता है. लेकिन सच्चाई यह है कि ऊंची जातियों के लोग, जिनकी जनसंख्या पिछड़े समुदायों के मुकाबले बहुत कम है, फिर भी सरकारी नौकरियों और राजनीति में सबसे अधिक दिखते हैं’.
2 अक्टूबर 2023 को बिहार सरकार ने जातिगत सर्वेक्षण के नतीजे जारी किए थे. इस रिपोर्ट के अनुसार अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) राज्य की कुल जनसंख्या का 63 प्रतिशत है. बिहार की कुल जनसंख्या 13.07 करोड़ बताई गई थी. इसमें EBC की जनसंख्या 36.01 प्रतिशत थी, जो राज्य का सबसे बड़ा सामाजिक समूह बना. OBC की संख्या 27.12 प्रतिशत रही. इसके अलावा दलित (SC) 19.65 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति (ST) 1.68 प्रतिशत पाई गई.
सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि तेजस्वी यादव का समुदाय, यानी यादव, OBC में सबसे बड़ा समूह है, जिसकी जनसंख्या 14.27 प्रतिशत है. वहीं सामान्य वर्ग (ऊंची जाति) की जनसंख्या 15.52 प्रतिशत है, जो 1990 के मंडल आंदोलन से पहले तक बिहार की राजनीति में सबसे प्रभावी रहा था.
टिकट बंटवारे पर असर
जातिगत जनगणना के नतीजों के बाद अब राजनीतिक दलों पर चुनाव में टिकट बंटवारे में समुदायों को उनके जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व देने का दबाव बढ़ गया है. बिहार में अब तक टिकट वितरण में ऊंची जातियों का दबदबा रहा है. लेकिन अब अन्य वर्ग भी अपने हिस्से की मांग कर रहे हैं और उनके पास इसका ठोस आंकड़ा भी है.
पिछले विधानसभा चुनाव में ऊंची जातियों, जो राज्य की कुल जनसंख्या का करीब 15 प्रतिशत हैं, को टिकट बंटवारे में भारी तवज्जो दी गई थी. बीजेपी ने 47.3 प्रतिशत टिकट ऊंची जातियों के उम्मीदवारों को दिए थे, जबकि कांग्रेस ने 40 प्रतिशत सीटें ऊंची जातियों को दी थी.
2025 का चुनाव सिर्फ आरजेडी के मंडल बनाम बीजेपी के कमंडल की लड़ाई नहीं होगी, बल्कि यह भी देखने लायक होगा कि बिहार का नेतृत्व पहचान की राजनीति से आगे बढ़कर वास्तविक बदलाव ला सकता है या नहीं!
जातिगत आंकड़ों ने न केवल सामाजिक न्याय, आरक्षण बढ़ाने, कल्याणकारी योजनाओं और आर्थिक नीतियों पर बहस को फिर से तेज कर दिया है, बल्कि राजनीतिक दलों को भी नई रणनीति अपनाने के लिए मजबूर किया है. अब सभी पार्टियां आगामी विधानसभा चुनाव में राजनीतिक लाभ पाने के लिए अपनी चुनावी रणनीति को जातिगत गणित के हिसाब से ढालने में जुटी हुई हैं.
पिछड़ा वर्ग का बीजेपी में स्थान!
जेडीयू और आरजेडी जातिगत जनगणना के आधार पर सामाजिक न्याय की राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं. वहीं बीजेपी के सामने रणनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है. अब तक ऊंची जातियों के समर्थन पर निर्भर रहने वाली बीजेपी को अब पिछड़े वर्गों की बढ़ती राजनीतिक आकांक्षाओं को साधने की जरूरत है. बीजेपी का हिंदुत्व एजेंडा अब तक जाति आधारित राजनीति से ऊपर माना जाता था, लेकिन जातिगत सर्वेक्षण के बाद पहचान आधारित राजनीति फिर से मजबूत हो रही है. जिससे बीजेपी की हिंदुत्व नीति को चुनौती मिल सकती है.
बीजेपी की प्रवक्ता विनीता हरिहरण ने कहा
‘बीजेपी सिर्फ जातिगत राजनीति पर ध्यान देने के बजाय, पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए शिक्षा, कौशल विकास, उद्यमिता और बुनियादी ढांचे के विकास से जुड़े कई कदम उठा रही है. बीजेपी का मानना है कि चुनाव जातिगत समीकरणों के बजाय सुशासन, विकास और राष्ट्रीय प्रगति के मुद्दों पर लड़ी जानी चाहिए.
बीजेपी प्रवक्ता ने आगे कहा कि ‘बीजेपी का रिकॉर्ड बताता है कि उसने ओबीसी, दलित और आदिवासी समुदायों के लिए अन्य किसी भी पार्टी से ज्यादा काम किया है. हमने एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम को लागू किया, जिसमें दलितों और आदिवासियों के खिलाफ अपराधों पर सख्त सजा तय की गई. 2025-26 के बजट में एनडीए सरकार ने SC/ST कल्याण के लिए 3 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया है. इसके अलावा SC/ST उद्यमियों को 5 करोड़ से अधिक मुद्रा लोन दिए गए हैं, ताकि वे अपने व्यवसाय को बढ़ा सकें. बीजेपी ने शासन और नेतृत्व के अवसर देकर पिछड़े वर्गों को सशक्त किया है’.
जेडीयू बनाम आरजेडी: ईबीसी वोट बैंक की जंग
ईबीसी (अत्यंत पिछड़ा वर्ग) बिहार की कई चुनावों में निर्णायक भूमिका निभा चुका है. बिहार में 113 जातियों को ईबीसी श्रेणी में रखा गया है. जिनमें बिंद, मल्लाह, केवट, निषाद, लोहार, कुम्हार, सुनार, तेली और नोनिया जैसी प्रभावशाली जातियां शामिल हैं. नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ गठबंधन के बावजूद मुस्लिम वोट हासिल किए हैं, तो इसमें भी ईबीसी समुदाय का बड़ा योगदान रहा है. ईबीसी को पहले आरजेडी का ही मजबूत वोट बैंक समझा जाता था,साल 1990 से लालू यादव के नेतृत्व वाली आरजेडी को ईबीसी का मजबूत समर्थन मिलता था. मुसलमान और यादव तो उनके सबसे भरोसेमंद वोटर थे ही, लेकिन लालू यादव ईबीसी समुदाय को अपना “खामोश जिन्न” कहते थे. क्योंकि वे चुपचाप आरजेडी को समर्थन देते थे. 2004 लोकसभा चुनाव तक ईबीसी लालू का मजबूत वोट बैंक रहा, लेकिन उसके बाद समीकरण बदल गए और नीतीश कुमार ने ईबीसी को अपने पक्ष में कर लिया. 2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद, नीतीश कुमार ने ईबीसी को मंडल राजनीति से अलग करके जेडीयू के साथ जोड़ने की रणनीति अपनाई. 2006 में नीतीश कुमार ने ईबीसी के लिए 20 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया. जिससे उन्हें पंचायत, जिला बोर्ड और स्थानीय निकायों में प्रतिनिधित्व मिलने लगा. उन्होंने ईबीसी के मेधावी छात्रों के लिए वित्तीय सहायता देने की भी शुरुआत की.
2025 का चुनाव: किसका होगा ईबीसी वोटबैंक!
इस बार के चुनाव में ईबीसी समुदाय सबसे ज्यादा अहम हो गया है. खासकर आरजेडी के लिए, क्योंकि वह जेडीयू के इस परंपरागत वोटबैंक में सेंध लगाना चाहती है. इसीलिए पिछले विधानसभा चुनाव में जेडीयू ने 27 और आरजेडी ने 24 ईबीसी उम्मीदवारों को टिकट दिया था.
अब जब जातिगत जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक हो चुके हैं, तो इसका असर छोटे जातिगत दलों की सौदेबाजी पर भी पड़ेगा. जीतन राम मांझी की हम (HAM) और मुकेश सहनी की वीआईपी (VIP) जैसी पार्टियां अपने ईबीसी वोट बैंक के आधार पर बड़ी पार्टियों से बेहतर सौदेबाजी कर सकती हैं. 2025 का बिहार विधानसभा चुनाव इस बात पर निर्भर करेगा कि ईबीसी वोट किसके खाते में जाता है.
2024 लोकसभा चुनाव में पार्टियों का प्रदर्शन
बिहार में कुल 40 लोकसभा सीटें हैं. आम चुनाव में एनडीए ने जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए 30 सीटें जीती है. जबकी INDIA गठबंधन को सिर्फ 9 सीटें मिलीं. वहीं बीजेपी और जेडीयू ने 12-12 सीटें जीती, जबकि एलजेपी को 5 सीटें मिली. विपक्षी दलों में आरजेडी ने 4, कांग्रेस ने 3 और सीपीआई को 2 सीटें मिली.
हालांकि मत प्रतिशत के हिसाब से आरजेडी को 22.14 प्रतिशत, बीजेपी को 20.52 प्रतिशत और जेडीयू को 18.52 प्रतिशत वोट मिला है. अगर बिहार के 40 सांसदों की सामाजिक पृष्ठभूमि देखा जाए तो 13 ओबीसी सांसदों में 7 यादव, 6 दलित जो सभी आरक्षित सीटों से चुने गए हैं.
बिहार विधानसभा चुनाव 2020 का परिणाम
बिहार में विधानसभा की कुल सीट 243 है. जिसमें से एनडीए ने 125 सीटें जीती है, जबकि आईएनडीआईए (INDIA) गठबंधन को 110 सीटें मिलीं. वहीं सबसे अधिक 75 सीटें जीतकर आरजेडी प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने में कामयाबी रही. दूसरी तरफ बीजेपी को 74 और जेडीयू को 43 सीटें मिली. जबकि कांग्रेस केवल 19 सीटें ही जीतने में कामयाब रही.
बिहार जाति जनगणना पर कानूनी चुनौतियां!
जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाई कोर्ट के उस फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसमें बिहार सरकार के 65 प्रतिशत आरक्षण को असंवैधानिक करार दिया गया था. बिहार सरकार ने जाति जनगणना के आधार पर पिछड़े वर्गों (ओबीसी, ईबीसी), अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण बढ़ाने का फैसला किया था.
बिहार विधानसभा ने नवंबर 2023 में एक संशोधन पास किया, जिसके तहत शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में ओबीसी, ईबीसी, एससी और एसटी के लिए आरक्षण 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत कर दिया गया. इसके अलावा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण जोड़ने के बाद कुल आरक्षण 75 प्रतिशत तक पहुंच गया था.
पटना हाई कोर्ट का फैसला
20 जून 2024 को पटना हाई कोर्ट ने इस संशोधन को असंवैधानिक घोषित कर दिया. अदालत ने कहा कि कोई विशेष परिस्थितियां नहीं थी. जिनके आधार पर बिहार सरकार 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा को पार कर सकें.
चुनौती देने वाले पक्ष की दलीलें
जो लोग 65 प्रतिशत आरक्षण के खिलाफ गए, उन्होंने तर्क दिया कि यह 1992 के इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार के ऐतिहासिक फैसले का उल्लंघन है, जिसमें आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तय की गई थी. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सरकार ने जाति जनगणना के आंकड़ों का सही विश्लेषण किए बिना आरक्षण बढ़ाने का फैसला किया. उनका दूसरा तर्क यह है कि आरक्षण तय करने के लिए आर्थिक स्थिति एक महत्वपूर्ण आधार होती है. लेकिन सरकार ने सिर्फ जनसंख्या के आंकड़ों पर ध्यान दिया.
बिहार सरकार की दलील
बिहार सरकार ने अपना बचाव करते हुए कहा कि 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा कोई सख्त नियम नहीं है और विशेष परिस्थितियों में इसे पार किया जा सकता है. सरकार का कहना था कि बिहार की 85 प्रतिशत आबादी पिछड़े वर्गों से आती है. लेकिन उन्हें सरकारी नौकरियों और शिक्षा में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिली हैं. सरकार ने तर्क दिया कि यह अन्याय होगा कि केवल 15 प्रतिशत सवर्ण आबादी को 50% सीटों और नौकरियों का लाभ मिले. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में अंतिम फैसला क्या सुनाता है.
राष्ट्रीय स्तर में जाति जनगणना पर बढ़ती सहमति
ओडिशा, महाराष्ट्र और झारखंड की विधानसभाओं में जातिगत जनगणना की मांग को मंजूरी दे दी गई है. वहीं तेलंगाना और कर्नाटक में जातिगत सर्वे पूरा हो चुका है, लेकिन अभी तक इसके आंकड़े जारी नहीं किए गए हैं. अब यह देखना होगा कि आगामी विधानसभा चुनाव में जातिगत समीकरण कैसे बदलते हैं और राजनीतिक दल किस तरह से अपने चुनावी रणनीति बनाते हैं. खासकर पिछड़े वर्गों (OBC, EBC), अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के मतदाताओं को लुभाने सियासी पार्टियां क्या कदम उठाती है.













