आज ही के दिन 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे और उसके साथियों ने मिलकर महात्मा गांधी की हत्या कर दी थी। इस घटना को 77 साल हो चुके हैं, लेकिन आज भी इस दिन को याद कर दिल दहल सा जाता है। क्योंकि भारत ने इस दिन अपने उस महान सपूत को खो दिया था, जिसने अपना संपूर्ण जीवन देश के उत्थान और स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया था। जो कि केवल एक व्यक्ति नहीं थे बल्कि वे सत्य, अहिंसा और सहिष्णुता के प्रतीक थे। उन्होंने न केवल भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि पूरी दुनिया को शांति और अहिंसा का पाठ भी पढ़ाया, जिसे आज भी एक प्रभावी हथियार के रूप में देखा जाता है। गाँधी के महानता को दर्शाते हुए महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था, “भविष्य की पीढ़ियों को इस बात पर विश्वास करने में मुश्किल होगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई व्यक्ति कभी धरती पर आया था।” लेकिन 30 जनवरी 1948 की शाम को दिल्ली के बिरला हाउस में इसी महान सपूत की हत्या कर दी गई। इस हत्या के पीछे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विशेष विचारधारा थी—एक ऐसी विचारधारा जो असहिष्णुता, संकीर्ण राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता पर आधारित थी। अफ़सोस की बात यह है कि जिस गांधी को पूरी दुनिया ने अपने आदर्श के रूप में स्वीकार किया, जिसके विचारों पर दुनिया आज भी चर्चा करती है, उसे उनके अपने देश में ही सबसे कम समझा और पढ़ा गया। आज भारत में गांधी को मारने वाली विचारधारा बड़े स्तर पर फल-फूल रही है। देश के बंटवारे जैसे मुद्दों को लेकर गांधी पर दोष मढ़ा जाता है और इसी बहाने गोडसे को महिमामंडित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
देश में बढ़ते नाथूराम गोडसे के समर्थक
आज भारत में नाथूराम गोडसे को सही ठहराने और उसकी विचारधारा को बढ़ावा देने की कोशिशें तेज़ हो रही हैं। कई लोग गोडसे को राष्ट्रवादी नायक के रूप में देखते हैं और उसकी हत्या को एक राष्ट्रहित में उठाया गया कदम मानते हैं। वही हाल के वर्षों में दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगों ने गोडसे को एक हत्यारे के बजाय एक प्रखर राष्ट्रवादी के रूप में पेश करने की कोशिश की है और दुखद यह है कि वे इसमें धीरे-धीरे सफल भी हो रहे हैं। ऐसे लोग तर्क देते हैं कि नाथूराम गोडसे ने राष्ट्रवाद के प्रति अपनी वफादारी निभाने के लिए महात्मा गांधी की हत्या की थी। गोडसे समर्थकों के इस बढ़ते प्रभाव को कई रूपों में देखा जा सकता है—चौक-चौराहों, सेमिनारों, महफ़िलों और राजनीतिक रैलियों में गांधीजी की आलोचना और नाथूराम गोडसे का महिमामंडन किया जा रहा है।
इनके अलावा भी गोडसे की मूर्तियां स्थापित की जा रही हैं, कुछ संगठन उसकी तस्वीर के साथ रैलियां निकालते हैं और गांधी के सहिष्णुता एवं धर्मनिरपेक्षता के आदर्शों को खुली चुनौती देते हैं। यह प्रवृत्ति न केवल भारत की बहुलतावादी परंपरा के लिए खतरा है, बल्कि देश को नफरत की खाई में धकेल रही है, जिसका अंजाम नुक़सान के सिवाय कुछ भी नहीं है। क्योंकि नफरत अपने साथ सिर्फ बर्बादी लेकर आती है।
गांधी के सपनों वाले भारत का भविष्य?
बढ़ते धार्मिक ध्रुवीकरण के इस माहौल में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि गांधी के सपनों वाले समावेशी भारत का भविष्य क्या होगा? क्या हम उनके दिखाए गए अहिंसा, प्रेम और एकता के मार्ग पर चल पाएंगे, या फिर नफरत की राजनीति में और गहराई तक धंसते जाएंगे?
गांधी जी ने यंग इंडिया के 10-09-1931के अंक में अपने सपनों के भारत का वर्णन करते हुए कहा था: “मैं ऐसे भारत के निर्माण की कोशिश करूंगा, जहां गरीब से गरीब व्यक्ति भी यह महसूस करेगा कि यह देश उसका अपना है और उसके निर्माण में उसकी आवाज़ का भी महत्व है। जहां सभी धर्मों के लोग आपस में मिलकर रहेंगे और किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होगा। ऐसे भारत में अस्पृश्यता, शराब और किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों के लिए कोई जगह नहीं होगी। वहां स्त्रियों को वही अधिकार प्राप्त होंगे, जो पुरुषों को मिलते हैं। हमारा संपूर्ण विश्व के साथ शांति का संबंध होगा—न हम किसी का शोषण करेंगे, न होने देंगे। इसलिए हमारी सेना न्यूनतम होगी। ऐसे भारत में केवल उन्हीं हितों का सम्मान किया जाएगा, जो करोड़ों मूक लोगों के हितों के विपरीत नहीं होंगे। यही है मेरे सपनों का भारत… इससे भिन्न किसी भी स्थिति से मुझे संतोष नहीं होगा।”
लेकिन आज की परिस्थितियों को देखकर यह स्पष्ट है कि गांधी के विचारों पर हमला जारी है। उनके योगदानों को नकारने की कोशिश जारी है। जो विचारधारा गांधी की हत्या के लिए ज़िम्मेदार थी, वह अब भी ज़िंदा है और लगातार मज़बूत हो रही है। गांधी को मारने वाली विचारधारा को समाप्त करना केवल सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह हर उस भारतीय का कर्तव्य है जो लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और सहिष्णुता में विश्वास रखता है।
जो यह मानते हैं कि ये दुनिया सिर्फ प्यार के लिए है, यहाँ नफरत और हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। यह समय है कि हम गांधी के विचारों को सिर्फ किताबों तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने जीवन में आत्मसात करें और उनके दिखाए मार्ग पर चलकर भारत को एक समावेशी और शांतिप्रिय राष्ट्र बनाने में योगदान दें। नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या करके यह सोचा होगा कि वह उनके विचारों को खत्म कर देगा, लेकिन इतिहास गवाह है कि विचारों को गोलियों से नहीं मारा जा सकता।
गांधी आज भी जीवित हैं—उनकी अहिंसा की शिक्षाएं, उनके सत्य के प्रयोग और उनका प्रेम का संदेश आज भी पूरी दुनिया में गूंजता है। लेकिन यह भी सच है कि गांधी को मारने वाली विचारधारा आज भी जीवित है। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम गांधी के विचारों को अपनाकर उनके सपनों के भारत को साकार करें या फिर असहिष्णुता और नफरत की राजनीति का शिकार बन जाएं।













